कोरोनावायरस संक्रमण काल और रावण का कद

कोरोनावायरस संक्रमण काल और रावण का कद

आज विजयदशमी के दिन प्रातः काल दशहरा मैदान के सामने से जा रहा था। सामने मैदान में रावण का पुतला खड़ा था, परंतु उसका कद पिछले वर्षों की तुलना में बहुत कम नजर आ रहा था। 
साहित्यकारों को मां सरस्वती प्रदत क्षमता होती है जो उन्हें पशु पक्षी पेड़ पौधे एवं निर्जीव वस्तुओं से भी बात करने की योग्यता प्रदान करती है।
 इसलिए मन में आया कि रावण के पुतले से ही बात कर ली जाए।
  रावण को अभिवादन करते हुए मैं ने कहा, हे शिव भक्त रावण! "क्या कोराना वायरस संक्रमण का असर हम मनुष्यों की तरह तुम पर भी पड़ गया है?"
रावण का पुतला मेरी तरफ देख कर मुस्कराते हुए बोला भगवान श्रीराम ने रावण के कर्म फल के कारण त्रेता युग में ही रावण का वध कर दिया था।
लेकिन तुम राम के आदर्शों को अपना ना सके।
मैं तो मनुष्य के भीतर रहने वाला रावण हूं।
जैसे-जैसे मनुष्य के अंदर अन्याय,अहंकार, क्रोध,लोभ, लालच , घृणा, ईर्ष्या, द्वेष , पाखंड, झूठ, वासना बढ़ती है । उसके प्रतीक रूप में बाहर भी मेरी ऊंचाई बढ़ती जाती है।
तुम्हारी ही खराब आदतों के कारण यह कोरोनावायरस संक्रमण तुम्हारे बीच आया है जो मनुष्य आबादी के लिए ही खतरा बना हुआ है।
उसकी ताकत इतनी विशाल है कि तुम उसका सामना सीधे-सीधे नहीं कर सकते।
 वह तो समय रहते हुए अपने गुरुजनों की बातें मानते हुये तुम्हारे कुछ अच्छे संस्कार पल्लवित हुए हैं।
जिस कारण वर्तमान समय में तुम्हारे अंदर का रावण भी कम हुआ है।
  इसी कारण इस वर्ष बाहर दिखाई देने वाला मेरा कद भी छोटा दिख रहा है।
लेकिन मैं देख रहा हूं कि तुम्हारे भीतर आया यह बदलाव बहुत ही अस्थाई है।
 तुम अंदर से बदलना ही नहीं चाहते।
तुम्हारे भीतर का अहंकार ,बढ़ता ही जा रहा है। छोटी-छोटी देवी स्वरूप कन्याओं को भी शैतानों के रूप में तुम अपनी वासना का शिकार बना रहे हो, झूठ और अन्याय तो तुम्हारे सहज सुलभ साधन बन गए हैं।
 तुम इस संक्रमण काल को भी एक अवसर के रूप में ले सकते थे।
विवेक रूपी ज्ञान के द्वारा अपने भीतर के रावण को हमेशा समाप्त कर सकते थे।
 उस स्थिति में बाहर भी रावण के पुतले की न केवल ऊंचाई कम होती बल्कि उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता।
 तुम हर साल बाहर मेरी ऊंचाई बढ़ाते हो लेकिन सच तो यह है साल दर साल मेरा कद मनुष्य के अंदर बढ़ता जा रहा है।
विडंबना यह है कि मैं राम के आदर्शों के सहारे मुक्ति चाहता हूं और तुम रावण बनकर खुश होते हो।
उसकी बातों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
मुझे किसी कवि की पंक्तियां याद आयीं- 
"त्रेता युग में एक राम ही काफी थे एक रावण का वध करने को" ।
"अब गली-गली में रावण हैं इतने राम कहां से लाऊं?"
  और मैं अपना सा मुंह लेकर घर लौट चला।

धन्यवाद।
डॉ गजेन्द्र कौशल
भोपाल

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