नकारात्मक विचारों की उपज है कोरोना वायरसवर्तमान परिस्थितियां एवं सकारात्मक विचार
नकारात्मक विचारों की उपज है कोरोना वायरस
वर्तमान परिस्थितियां एवं सकारात्मक विचार
पढ़ने में यह आश्चर्यजनक अवश्य लग सकता है कि कोरोना वायरस हमारे विचारों की उपज कैसे हैं?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हमेशा कई लोगों ने यह कल्पना की कि एक युद्ध ऐसा अवश्य होगा जो परमाणु बम के युद्ध जैसा नहीं होगा जिसमें जन की हानि तो होगी लेकिन बड़ी-बड़ी इमारतें और हमारे उपयोग के लिए बनाए गए साधनों का नाश नहीं होगा। वह अपनी जगह सुरक्षित रहेंगे।
विचारकों , किताब के लेखकों, टीवी सीरियल एवं फिल्म के निर्माताओं ने न केवल इस तरह के वायरस की स्पष्ट कल्पना की बल्कि वह कैसे उत्पन्न होगा, मानवीय सभ्यता को इससे कितनी भीषण हानि होगी उसका भी सटीक चित्रण किया, जिसने हमेशा विश्व के एक बड़े जनसमूह के मन मस्तिष्क को प्रभावित किया।
जैविक युद्ध को लेकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक एवं विश्व के राजनेता हमेशा चिंतित रहे। इसी डर और परिकल्पना ने उस स्थिति को जन्म दिया जिसे आज हम सामने देख रहे हैं।
आज जब पश्चिम के विकसित देश नैराश्य के वातावरण में डूब रहे हैं। उन्हें इससे उबरने की कोई राह नजर नहीं आ रही।
धीरे-धीरे यह काली छाया सब को अपने आगोश में लेती जा रही है।हमारा राष्ट्र भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।
तब क्या इसका कोई समाधान नहीं है?
हमारे मनीषियों एवं तत्वदर्शी ज्ञानियों ने हमेशा ही माना है कि यह सृष्टि परम चेतना के विचार से ही उत्पन्न हुई है।
वेदों एवं उपनिषदों में लिखा महावाक्य "एको अहोम बहु श्याम" वह एक ही अनेक रूपों में व्यक्त हुआ है।
अध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण भारतीय सनातन संस्कृति को प्रकृति ने यह मौका दिया है कि उसी परम चेतना के शाश्वत अंश होने के कारण हम सब में भी वह शक्ति है, जो किसी भी चीज को जन्म दे सकती है।
यह भी एक अटल सत्य है कि नकारात्मक घटनाओं को सच होने में वक्त लगता है।
इसके विपरीत पूर्ण एकाग्रता के साथ किए गए सकारात्मक विचार जल्दी फलीभूत होते हैं।
इसलिए सकारात्मकता के साथ कार्य करते हुए अपने विचारों में
सबके स्वस्थ रहने की कामना करते हुए एक शक्तिशाली समृद्ध भारत की परिकल्पना करें।
यदि इसे हम दिमाग की गहराइयों में उतार सके तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
*हमारी संस्कृति हमारे लिए गर्व का विषय है*
धन्यवाद।
डॉ.गजेन्द्र नाथ कौशल,
भोपाल