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सोशल मीडिया और मकर संक्रांति

सोशल मीडिया और मकर संक्रांति ( आप बीती ,एक व्यंग्य) सोशल मीडिया की हम चाहें लाख बुराई करें पर सोशल मीडिया त्योहारों पर जान तो ला ही देती है इस बार तो मकर संक्रांति पर पूरी क्रांति ही दिखाई दी। पूरे फोन की मेमोरी मकर संक्रांति के मैसेजेस से भर गई। पिछले दिनों से कड़कड़ाती सर्दी पड़ने के कारण सुबह-सुबह रजाई से निकलने को ही मन नहीं करता पर तभी श्रीमती जी की  कड़कड़ाती आवाज हमारे कानों में पड़ी। हमेशा कहते रहते हो बचपन में खूब पतंग उड़ाई है, बहुत पतंगे लूटी  हैं पिछले 3 दिन से पतंग और मांझा की चखरी लाने की कह रही हूं,  मकर संक्रांति आ गई पूरे आलसी हो। पिछली मकर संक्रांति पर  मिसेज शर्मा ने अपने हस्बैंड के साथ पतंग उड़ाते हुए व्हाट्सएप पर सबसे पहले स्टेटस अपडेट कर दिया था।  किटी पार्टी में कितना इतरा रही थी। इससे तो अच्छा था कि मैं ऑनलाइन ही मंगा लेती।  आपके लिए मंगोड़े बनाने की सोच रही थी परंतु अब खिचड़ी  ही बनाऊंगी ‌।  तभी एक आवाज और कानों  में पड़ी झाड़ू- पोछा करने वाली मेहरी  इनसे कह रही थी दीदी, गुप्ता मैडम तो व्हाट्सएप देख- देख कर बिल्क...

सामाजिक और आर्थिक स्थिति के फेर में उलझती सोन पपड़ी मिठाई

सोन पपड़ी , बेसन, मैदा, शक्करऔर शुद्ध  घी से निर्मित होने वाली सोने की तरह ही चमकदार परत दर परत रेशे युक्त एक ऐसी मिठाई है जिस की खुशबू से लेकर मुंह में रखने पर एक अलग ही आनंद आता है। दिल्ली ,आगरा,कानपुर ,फिरोजाबाद और जम्मू के पास पटनीटॉप के रास्ते में कुद यहां की देसी घी की बनी हुई सोन पपड़ी जिसे पतीशा भी कहते हैं कि एक अलग ही बात होती है। समय के साथ वनस्पति तेलों से बने घी की सोन पपड़ी और हल्दीराम जैसे मिठाई बनाने वालों ने इसे सहज ,जनसाधारण तक उपलब्ध करा दिया। और यहीं से सोन पपड़ी की स्थिति एक  सादगी,  विनम्र, , सज्जन पुरुष की तरह हो गई। जिसे चाहते तो सब है परंतु उसका उतना आदर नहीं करते जिसका वह हकदार होता है।  उच्च वर्ग इसे पसंद तो करता है तथा इसका आनंद भी उठाता है  परंतु उन्हें लगता है यह उनकी हैसियत के अनुरूप नहीं है।  इसी देखा देखी के चलते मध्यमवर्ग ने भी इसको झिड़कना शुरू कर दिया।  अपनी कहानी किस्सों में इसे ऐसे व्यंग का पात्र बना दिया जिस कारण पैकेट से बाहर निकालने में भी संकोच लगने लगा। इसके साथ ही इसकी जिंदगी एक घर से दूसरे घर तक सफर करने में...

जगत जननी आदिशक्ति मां जगदंबा, प्रकृति की क्रियाशीलता एवं मिथ्या कर्तापन का अहंकार

जगत जननी आदिशक्ति मां जगदंबा, प्रकृति की क्रियाशीलता एवं मिथ्या कर्तापन का अहंकार    इस चराचर जगत में जिस प्रकृति के हमें दर्शन होते हैं वह आदिशक्ति मां जगत जननी का विराट स्वरूप ही है जिससे इस संसार का निर्माण हुआ है। महाकाली, महागौरी, महादुर्गा श्री लक्ष्मी, मां अन्नपूर्णा तथा इस संसार की समस्त मातृशक्ति उसके ही विभिन्न स्वरूप हैं।  जिसमें मां जगदंबा की सभी शक्तियां निहित होती है।  इस संसार की समस्त क्रियाशीलता एवं कर्म का कारण मां आदिशक्ति के रूप में प्रकृति के गुणों एवं चित्त की वृतियाँ ही है वस्तुत: देखा जाए तो यह मानवीय चित्त भी प्रकृति द्वारा ही निर्मित है । परमात्मा के सानिध्य में सारे कर्म जगत जननी के रूप में प्रकृति स्वयं करती है । परंतु मिथ्या अहं के कारण जीव स्वयं को कर्ता मानकर मां की शक्ति माया के वशीभूत हो सुख एवं दुख की मरीचिका में भटकता है।  इसी मिथ्या कर्तापन के अज्ञान के कारण उसके भीतर अहंकार का रोग जन्म लेता है।  यही अहंकार जब मैं और मेरा बनता है तो राग पनपता है,  और जब तू और तेरा बनता है तो द्वेष की भावना जन्म लेती है जब हमार...

कोरोनावायरस संक्रमण काल और रावण का कद

कोरोनावायरस संक्रमण काल और रावण का कद आज विजयदशमी के दिन प्रातः काल दशहरा मैदान के सामने से जा रहा था। सामने मैदान में रावण का पुतला खड़ा था, परंतु उसका कद पिछले वर्षों की तुलना में बहुत कम नजर आ रहा था।  साहित्यकारों को मां सरस्वती प्रदत क्षमता होती है जो उन्हें पशु पक्षी पेड़ पौधे एवं निर्जीव वस्तुओं से भी बात करने की योग्यता प्रदान करती है।  इसलिए मन में आया कि रावण के पुतले से ही बात कर ली जाए।   रावण को अभिवादन करते हुए मैं ने कहा, हे शिव भक्त रावण! "क्या कोराना वायरस संक्रमण का असर हम मनुष्यों की तरह तुम पर भी पड़ गया है?" रावण का पुतला मेरी तरफ देख कर मुस्कराते हुए बोला भगवान श्रीराम ने रावण के कर्म फल के कारण त्रेता युग में ही रावण का वध कर दिया था। लेकिन तुम राम के आदर्शों को अपना ना सके। मैं तो मनुष्य के भीतर रहने वाला रावण हूं। जैसे-जैसे मनुष्य के अंदर अन्याय,अहंकार, क्रोध,लोभ, लालच , घृणा, ईर्ष्या, द्वेष , पाखंड, झूठ, वासना बढ़ती है । उसके प्रतीक रूप में बाहर भी मेरी ऊंचाई बढ़ती जाती है। तुम्हारी ही खराब आदतों के कारण यह कोरोनावायरस संक्रमण तुम्हारे बीच आया...

कोरोना वायरस का बढ़ता संक्रमण एवं लॉक डाउन के चक्रव्यूह से बाहर आना (निराशा और भय से मुक्त हो विशेष सावधानी की जरूरत)

कोरोनावायरस की इस वैश्विक महामारी में भारत में 24 मार्च को प्रथम लॉक डाउन का आगाज हुआ था उस समय देश में कोरोनावायरस संक्रमितों की संख्या 500 से भी कम थी आज जब 2 माह के पश्चात लॉक डाउन 4.0 चल रहा है कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या सवा लाख से ऊपर पहुंच गई है। लॉकडाउन के प्रत्येक चरण के साथ लाॅक डाउन में छूट दी गई है। देश के कुछ बड़े शहर अभी भी कोरोना के हॉट स्पॉट बने हुए हैं मुंबई में तो प्रतिदिन ढाई से तीन हजार की संख्या में नए संक्रमित होने लगे हैं। इतने दिनों के लाॅकडाउन के पश्चात हर देशवासी की आर्थिक स्थिति कमजोर हुई है ।  इस के साथ ही सरकार के खर्चे भी अप्रत्याशित रूप से बड़े हैं जबकि आय के साधनों में  जबरदस्त कमी हुई है । सरकार अपनी तरफ से पूर्ण प्रयास कर रही है।   सरकार पर भी पूर्ण रूप से निर्भर रहना उचित नहीं है । हमें अपने खर्चों में भी कटौती करनी होगी। ऐसा भी नहीं है की लॉक डाउन से हमें फायदा नहीं हुआ है‌ हम इस बीमारी को नियंत्रित रखने में काफी हद तक सफल हुए हैं।  हमारा स्वास्थ्य तंत्र इस बीमारी का सामना करने के लिए पहले से ज्यादा सक्षम है। ...

कोरोना वायरस संक्रमण, वर्तमान, भविष्य एवं सकारात्मकता

कोरोना वायरस संक्रमण, वर्तमान, भविष्य एवं सकारात्मकता ************************** अभी हम कोरोना वायरस के संक्रमण से भय ग्रस्त हैं कि इसका सामना कैसे करें। सोशल डिस्टेंसिंग ,क्वॉरेंटाइन, लॉक डाउन एवं तमाम तरह के उपाय एवं उपचारों के बाद हम इस संक्रमण से कैसे मुक्त हो पाएंगे।  मरीजों की संख्या में प्रतिदिन तेजी से बढ़ोतरी हो रही है जिसमें स्वास्थ्य कर्मी भी शामिल है हमारे मध्य प्रदेश में तो 2 चिकित्सकों की मौत भी हो गई है। मरीज ठीक अवश्य हो रहे हैं परंतु ना तो अभी हमारे पास इसका कोई ठोस कारगर इलाज है। इसकी वैक्सीन बनाकर इसे पूरी तरह समाप्त करने में अभी वक्त लगेगा। इस संक्रमण से जिंदगियों को कैसे बचायें वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती यही है। वही दूसरी ओर समाज का एक बड़ा वर्ग जिसमें बुद्धिजीवी अर्थशास्त्री तथा मनोवैज्ञानिक शामिल है। वह इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यह कोरोना वायरस का संक्रमण सभी लोगों के जीवन में एक बड़ा परिवर्तन लाएगा पूरा विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में होगा। कुछ  उधोग धंधों के स्वरूप में  परिवर्तन होगा तो कई उद्योग धंधे हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे जिससे लाखों लो...

नकारात्मक विचारों की उपज है कोरोना वायरसवर्तमान परिस्थितियां एवं सकारात्मक विचार

नकारात्मक विचारों की उपज है कोरोना वायरस वर्तमान परिस्थितियां एवं सकारात्मक विचार पढ़ने में यह आश्चर्यजनक अवश्य लग सकता है कि कोरोना वायरस हमारे विचारों की उपज कैसे हैं? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हमेशा कई लोगों ने यह कल्पना की कि एक युद्ध ऐसा अवश्य होगा जो परमाणु बम के युद्ध जैसा नहीं होगा जिसमें जन की हानि तो होगी लेकिन बड़ी-बड़ी इमारतें और हमारे उपयोग के लिए बनाए गए साधनों का नाश नहीं होगा। वह अपनी जगह सुरक्षित रहेंगे। विचारकों , किताब के लेखकों, टीवी सीरियल एवं फिल्म के निर्माताओं ने न केवल इस तरह के वायरस की स्पष्ट कल्पना की बल्कि वह कैसे उत्पन्न होगा, मानवीय सभ्यता को इससे कितनी भीषण हानि होगी उसका भी सटीक चित्रण किया, जिसने हमेशा विश्व के एक बड़े जनसमूह के मन मस्तिष्क को प्रभावित किया। जैविक युद्ध को लेकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक एवं विश्व के राजनेता हमेशा चिंतित रहे‌। इसी डर और परिकल्पना ने उस स्थिति को जन्म दिया जिसे आज हम सामने देख रहे हैं। आज जब पश्चिम के विकसित देश नैराश्य के वातावरण में डूब रहे हैं। उन्हें इससे उबरने की कोई राह नजर नहीं आ रही। धीरे-धीरे यह काली छाया सब को अपने ...