सामाजिक और आर्थिक स्थिति के फेर में उलझती सोन पपड़ी मिठाई

सोन पपड़ी , बेसन, मैदा, शक्करऔर शुद्ध  घी से निर्मित होने वाली सोने की तरह ही चमकदार परत दर परत रेशे युक्त एक ऐसी मिठाई है जिस की खुशबू से लेकर मुंह में रखने पर एक अलग ही आनंद आता है। दिल्ली ,आगरा,कानपुर ,फिरोजाबाद और जम्मू के पास पटनीटॉप के रास्ते में कुद यहां की देसी घी की बनी हुई सोन पपड़ी जिसे पतीशा भी कहते हैं कि एक अलग ही बात होती है।
समय के साथ वनस्पति तेलों से बने घी की सोन पपड़ी और हल्दीराम जैसे मिठाई बनाने वालों ने इसे सहज ,जनसाधारण तक उपलब्ध करा दिया।
और यहीं से सोन पपड़ी की स्थिति एक  सादगी,  विनम्र, , सज्जन पुरुष की तरह हो गई।
जिसे चाहते तो सब है परंतु उसका उतना आदर नहीं करते जिसका वह हकदार होता है।
 उच्च वर्ग इसे पसंद तो करता है तथा इसका आनंद भी उठाता है  परंतु उन्हें लगता है यह उनकी हैसियत के अनुरूप नहीं है। 
इसी देखा देखी के चलते मध्यमवर्ग ने भी इसको झिड़कना शुरू कर दिया।
 अपनी कहानी किस्सों में इसे ऐसे व्यंग का पात्र बना दिया जिस कारण पैकेट से बाहर निकालने में भी संकोच लगने लगा।
इसके साथ ही इसकी जिंदगी एक घर से दूसरे घर तक सफर करने
में ही व्यतीत होने लगी।
 अब ना आप सोन पपड़ी किसी को देते हुए खुश होते हैं ना किसी से मिलने पर।
सोन पपड़ी देते समय आप मात्र एक औपचारिकता पूरी करना चाहते हैं, जब आपको कोई सोन पपड़ी के पैकेट देता है तो आपको ऐसा लगता है कि उसने आपकी आर्थिक स्थिति, पद, सामाजिक रिश्ते की अहमियत का सही आकलन नहीं किया है।
ऐसी स्थिति में आप सोन पपड़ी को एक कोने में उठाकर पटक देते हैं।
आपकी मनो: स्थिति का शिकार बनती है निर्दोष सोन पपड़ी, जिसमें उसका कोई दोष नहीं।

 *सोने जैसी हूं इसलिए नहीं करती सोलह श्रंगार*

*मेरे तो हर रेशे और कण-कण में है आनंद अपार*

डॉ गजेन्द्र कौशल
भोपाल

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