जगत जननी आदिशक्ति मां जगदंबा, प्रकृति की क्रियाशीलता एवं मिथ्या कर्तापन का अहंकार
जगत जननी आदिशक्ति मां जगदंबा, प्रकृति की क्रियाशीलता एवं मिथ्या कर्तापन का अहंकार
इस चराचर जगत में जिस प्रकृति के हमें दर्शन होते हैं वह आदिशक्ति मां जगत जननी का विराट स्वरूप ही है जिससे इस संसार का निर्माण हुआ है। महाकाली, महागौरी, महादुर्गा श्री लक्ष्मी, मां अन्नपूर्णा तथा इस संसार की समस्त मातृशक्ति उसके ही विभिन्न स्वरूप हैं।
जिसमें मां जगदंबा की सभी शक्तियां निहित होती है।
इस संसार की समस्त क्रियाशीलता एवं कर्म का कारण मां आदिशक्ति के रूप में प्रकृति के गुणों एवं चित्त की वृतियाँ ही है वस्तुत: देखा जाए तो यह मानवीय चित्त भी प्रकृति द्वारा ही निर्मित है ।
परमात्मा के सानिध्य में सारे कर्म जगत जननी के रूप में प्रकृति स्वयं करती है ।
परंतु मिथ्या अहं के कारण जीव स्वयं को कर्ता मानकर
मां की शक्ति माया के वशीभूत हो सुख एवं दुख की मरीचिका में भटकता है।
इसी मिथ्या कर्तापन के अज्ञान के कारण उसके भीतर अहंकार का रोग जन्म लेता है।
यही अहंकार जब मैं और मेरा बनता है तो राग पनपता है,
और जब तू और तेरा बनता है तो द्वेष की भावना जन्म लेती है जब हमारा मन राग और द्वेष की जड़ता में उलझ जाता है तो अज्ञानता का अंधेरा छा जाता है अहंकार स्वयं में भ्रांति की कोख से उपजी भ्रांति है जो अस्तित्व में न होते हुए भी हमें सुख दुख का आभास कराती है ।
जब शक्ति आराधना के इन नौ दिनों में हम प्रकृति के सानिध्य में पूर्ण श्रद्धा के साथ मां की आराधना करते हैं तब जगत जननी मां की कृपा से हमारे मन पर पड़ा हुआ अज्ञान का पर्दा हट जाता है ।
जिस तरह परमात्मा ना तो स्वयं कर्ता है ना भोक्ता वह तो प्रत्येक स्थिति में नित्य, साक्षी एवं निर्लेप है ।
उसी परमात्मा की तरह हमारे भीतर विराजमान उसका सनातन अंश जीवात्मा भी वही है उसके ऊपर भी संसार की किसी बातों का प्रभाव नहीं पड़ता।
प्रकृति रूप में आदि शक्ति ही सारे खेल रचती है । उसके संतति रूप मे हम दिव्य देवीय गुणों का पोषण भी कर सकते हैं
जब हमारे भीतर और इस संसार में आसुरी शक्तियां जन्म लेती हैं तो वह इनका संहार भी करती है।
हमें चाहिए कि नवरात्रि के इन विशेष दिनों में मां की कृपा प्राप्त कर हम अपने भीतर बैठे हुए अहंकार के रावण पर विजय प्राप्त कर विजयदशमी पर्व का आगाज करें।
सकारात्मक भावनाओं से ओत-प्रोत हो मां लक्ष्मी के सानिध्य में आनंद की दीपावली मनाएं
धन्यवाद
डॉ.गजेंद्र नाथ कौशल,
भोपाल